अजीब लग सकता है लेकिन ये संभव है, ये बिल्कुल संभव है कि दो जोड़ी आँखों में एक ही सपना पल रहा हो. ये सपना जब ज़मीन पर उतरा तो इसका नाम “संगम” हुआ. मुझे पता नहीं था कि प्रोफ़ेसर रईस अल्वी की पलकों में भी इसी ख्वाब की कुलबुलाहट है- अपनी भाषा, साहित्य, संस्कृति को ज़िंदा रखने की चाह की कुलबुलाहट. खुलासा हुआ तब जब एक रोज़ अदनान भाई से मैंने अपने सपने का ज़िक्र किया. मेरी आँखों का सपना छोटा-सा था उसे विस्तार दिया अल्वी साहब की ख्वाहिशों ने. हम अपना साहित्यिक और सांस्कृतिक विरसा आगे की नस्लों को सौंपना चाहते हैं. हम सबको साथ लेकर चलना चाहते हैं वे चाहे जिस ज़मीन पर बसे हों, चाहे भारत के हों या पकिस्तान के और इसीलिए नाम है- “संगम”.
मैं अगर कहूं कि अदनान मिर्ज़ा भाई ने इस मेरे नन्हे सपने को ज़मीन दी है (ग्राउंड लेबल पर उनके इतनी लगन से काम किये जाने के बिना कुछ भी मुमकिन नहीं था) और अल्वी साहब ने आसमान तो गलत नहीं होगा. प्रोफ़ेसर रईस अल्वी साहब का ये बड़ा सपना जिसमें संगम शिक्षा (तालीम), संगम समाज, संगम पत्रिका और संगम संस्कृति (तहज़ीब) शामिल हैं और मेरी आँखों का नन्हा सपना जो बस संगम पत्रिका तक था अब पूरी संगम टीम की आँखों का साझा सपना है. मैं प्रीता व्यास इस सपने में हिंदी एडिटर के तौर पर अपनी ज़िम्मेदारी निभाने का प्रयास करूंगी. आप सब की शुभकामनाएं और सहयोग अपेक्षित है.
———प्रीता व्यास

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